जेठ की तपती दोपहरी में ठोकरें खा रहा संस्कारों का मारा वृद्ध पिता के दूखद शब्दों को उखेरा कवि सुंदर लाल ने कविता के माध्यम से

जेठ की तपती दोपहरी में ठोकरें खा रहा संस्कारों का मारा वृद्ध पिता के दूखद शब्दों को उखेरा कवि सुंदर लाल ने कविता के माध्यम से
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।।संस्कार।।

जेठ की तपती दोपहरी में
दर-दर भटक रहा एक वृद्ध बेचारा।
दिखने में वह बड़ा स्वावलंबी था,
ठोकरें खा रहा संस्कारों का मारा।।

सर पर एक छोटा सा गमछा,
नंगा बदन बस इज्जत ढकी थी।
जेठ की तपती दोपहरी में,
जल -जलकर चमड़ी फटी थी।

मैंने उसके पास में जाकर,
हाथ जोड़कर प्रणाम किया,
बाबा मैं हूं पूत्र तुम्हारा,
चरण छू कर नमन किया।।

दिलासा देकर मैंने पूछा,
बाबा आप अनाथ हो?
चलो साथ में मेरे अब,
आप वृद्धाश्रम के नाथ हो।।

इतना सुनते ही वह बोला,
मैं तीन -तीन पुत्रों वाला हूं।
मेरे बेटे बड़े शहर में,
मैं पिता उन अफसरों वाला हूं।।

सारा जीवन कमा कमा कर,
मैंनेउनको बहुत पढ़ाया था।
खुद भूखे रहकर भी,
मैंने उनको अफसर बनाया था ।।

शादी कर दी उनकी पसंद की,
अब वो पैसे वाले हैं।
मैं दर-दर की ठोकरें खाता,
अब वो महलों वाले हैं।।

पैतृक संपत्ति बेचकर मेरी,
मुझे शहर में लाए थे।
एक-एक माह का पिता रहूंगा,
मातृ शोक में जब वो आए थे।।

मेरी आंखें फटी रह गई,
सुन बाबा की करुण चित्कार।
बेटा औलाद को पढ़ा मत देना,
गायब हो जाएंगे संस्कार।।

मैंने दौड़ाई अपनी निगाहें,
घर-घर में यह आभास हुआ ।
ज्यों ज्यों शिक्षा ने प्रगति की,
संस्कारों का विनाश हुआ।।

वृद्ध माता-पिता बोझ बने हैं,
यह संस्कार कहां से आता है।
शर्म आती है ऐसे विचार पर,
फिर समाज में मान कहां से आता है।।

ऊंची शिक्षा प्राप्त करो,
पर पांव जमीन से ना छूटे।
मां-बाप भाई बहन,
चाचा ताऊ क्यों बंटे।।

आओ मिलकर संकल्प लें,
जमीन से जुड़ कर रहें ।
खत्म ना हो हमारे संस्कार,
युवा पीढ़ी से ये बात कहें।।

।।सुंदरलाल
उप निरीक्षक
राजस्थान पुलिस।।