नैचुरल फार्मिंग की अनुठी मिसाल,देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले 10वीं पास किसान लोगो के लिए बने प्रेरणा

नैचुरल फार्मिंग की अनुठी मिसाल,देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले 10वीं पास किसान लोगो के लिए बने प्रेरणा
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कहते है कि किताबी ज्ञान की तुलना में अनुभव आपको अधिक सिखाता है। राजस्थान के झालावाड़ में रहने वाले किसान हुकुमचंद पाटीदार ने यह कथन सत्य साबित कर दिखाया। 10वीं क्लास पास करने के बाद उन्होंने एकेडमिक ज्ञान या डिग्री हासिल नहीं की। आपको बता दें कि हुकुमचंद पाटीदार को नेचुरल फार्मिंग के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। अब वे राजस्थान के कृषि विश्वविद्यालयों में ग्रैजुएशन और मास्टर्स डिग्री के लिए पढ़ने वाले युवाओं के लिए खेती-किसानी की पढ़ाई का सिलेबस तैयार कर रहे हैं। एग्रीकल्चर में बीएससी, एमएससी और रिसर्च (पीएचडी) करने को इच्छुक युवा हुकुमचंद पाटीदार के व्यावहारिक जीवन के अनुभव से अब लाभ उठा सकेंगे।

प्राकृतिक खेती में प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस रखने वाले झालावाड़ निवासी हुकुमचंद पाटीदार को 2019 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में योगदान के लिए देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से उन्हें नवाजा जा चुका है। हुकुमचंद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की समिति के सदस्य भी हैं। ICAR भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आता है।

प्राकृतिक खेती का अनुभव अब सिलेबस में

पाटीदार को यह उम्मीद है कि प्राकृतिक खेती भारत में कई समस्याओं का समाधान कर सकती है। पद्म अवॉर्ड मिलने के बाद उन्होंने ये कहा था कि, ICAR ने खेती के दौरान होने वाली परेशानी से निपटने के लिए एक समिति का गठन किया है। उन्होंने ये भी बताया था कि ये समिति बीएससी, एमएससी और पीएचडी की कक्षाओं में एग्रीकल्चर से जुड़ी पढ़ाई के लिए पाठ्यक्रम तैयार करेगी। समिति में कुछ किसान, वैज्ञानिक और प्रोफेसर भी शामिल हैं। इसकी रिपोर्ट में कई विषयों पर किए गए शोध होंगे। रिसर्च का मकसद कृषि में लगने वाले खर्च को कम करना है।

किसानों ने अपनाया पाटीदार का मॉडल

आपको बता दें कि हुकुमचंद पाटीदार खेती के क्षेत्र में झालावाड़ जिले में एक रोल मॉडल हैं। पाटीदार ने काफी गहन शोध और अध्ययन के बाद एक मॉडल तैयार किया है। जिसके बाद 200 से अधिक किसानों ने इस मॉडल को अपनाया है। इससे उनकी फसलों का उत्पादन काफी ज्यादा बढ़ा है। मॉडल के पॉजिटिव रिजल्ट को देखते हुए और भी लोग इससे लगातार जुड़ रहे हैं। खेती में हुकुमचंद पाटीदार के इस मॉडल को प्रकृति- और पशु-आधारित जैविक कृषि के रूप में जाना जाता है।

इस मॉडल की चर्चा कोटा, इंदौर और झालावाड़ के विश्वविद्यालयों में एक सफल मॉडल के रूप में की जाती है। इसके साथ ही कोर्स के रूप में पाटीदार के मॉडल पर आधारित प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इसी मॉडल को अब बीएससी, एमएससी और पीएचडी में भी पढ़ाने पर विचार किया जा रहा है ताकि खेती को लेकर लोगों का नजरिया बदला जा सके।